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Friday, 28 February 2014

डिमना बांध के विस्थापितों एवं अन्य जन समस्याओं के संबंध में टाटा स्टील को पत्र





                                                       -----------  स्मार पत्र
                                                                                                                     दिनांक : 23.07.2013
 प्रति      
     प्रबंधक निदेशक
     टाटा स्टील
     पूर्वी सिंहभूम, जमशेदपुर

विषय : डिमना बांध के विस्थापितों एवं अन्य जन समस्याओं के संबंध में

महाशय,

         डिमना बांध के विस्थापित विगत पांच बरसों से अपनी समस्याओं के समाधान के लिये प्रयासरत हैं। पहली बार जब हम 6 जनवरी 2009 को पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त को अपनी मांगों या समस्याओं से अवगत कराया तो उन्होंने सहानुभूति का रूख प्रदर्शित करते हुये अनुमंडलाधिकारी, धालभुम को इसके समाधान हेतु अधिकृत किया। उस समय से लेकर आज तक प्रशासन की पहल से टाटा स्टील के अधिकारियों एवं विस्थापित प्रतिनिधियों के बीच 18 दौर की त्रिपक्षीय वार्ता हो चुकी है। इस क्रम में कर्इ समस्यायें पूरी तरह से स्पष्ट हो गर्इ और वह निष्कर्ष तक पहुंच गया है। अब इस पर सिर्फ निर्णय लेना बाकी रह गया है। लेकिन दु:ख की बात है कि लगभग एक वर्ष बीतने के बावजूद टाटा स्टील एवं प्रशासन की ओर से अपेक्षित गंभीरता नहीं रही है, जिसकी वजह से मामला टलता जा रहा है।   इस परिस्थिति में डिमना बांध के विस्थापित शांतिमय धरना कार्यक्रम के माध्यम से पुन: एक बार आपका ध्यान आकृष्ट कराना चाहते हैं ताकि समाधान की दिशा में हम गतिमान हो सकें।

हमारी मांगें
  
1. विस्थापितों ने प्रारंभ में ही दावा किया था कि टाटा स्टील अवैध रूप से किसानों की जमीन दखल किये हुये है। टाटा स्टील ने इस दावे को खारिज कर दिया था। परंतु कर्इ दौर की वार्ता के बाद जिला प्रशासन की पहल पर टाटा स्टील की उपसिथति में सीमांकन कराया गया। इससे यह तथ्य सामने आया कि टाटा स्टील किसानों, वन विभाग एवं सरकारी जमीन का 102 एकड़ भूभाग पर कब्जा किये हुये है।
                       इस जमीन का अधिग्रहण नहीं हुआ है और न ही यह डूब क्षेत्र में है। परंतु इस पर टाटा स्टील के कब्जे के रूप में खंभे गाड़े गये हैं। इतना ही नहीं नक्शे में भी इस क्षेत्र को स्पष्ट रूप दर्शाया गया है।  इस जमीन की मालगुजारी का भुगतान रैयत करते रहे हैं। जबकि टाटा स्टील के सुरक्षा कर्मियों द्वारा उक्त जमीन पर खेती करने से किसानों को रोका जाता रहा है। बरसों से खेती से वंचित किसान व विस्थापित क्षतिपूर्ति की मांग कर रहे हैं तो कंपनी के प्रतिनिधि टाल मटोल में लगे हैं।

2. इसी तरह से सीमांकन एवं सर्वेक्षण के बाद यह तथ्य सामने आया कि किसानों का 3.84 एकड़ ऐसी जमीन डूब में आ रही है जिसका अधिग्रहण भी आज तक नहीं हुआ है। किसी की भी सम्पति को नुकसान पहुंचाना अपराध की श्रेणी में आता है। हमने वार्ता के दरम्यान टाटा स्टील से कहा कि वे उक्त जमीन पर खेती के नुकसान का  मुआवजा दें और डूब की स्थिति को रोकने की व्यवस्था करें या वैधानिक प्रक्रिया को अपनायें।  इस संबंध में कंपनी का रूख अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। हालांकि उन्होंने इतना जरूर कहा है कि कानूनी स्थितियों को वे स्वीकार करेंगे।

3. बांध विस्थापितों का यह दावा है कि उनके पूर्वजों को जमीन का समुचित मुआवजा नहीं मिला है। जमीन से उजाड़ते वक्त उन्हें एक किस्त का भुगतान किया गया और कहा गया कि बाकी दो किस्तों का भुगतान बाद में किया जायेगा। आजतक इस भुगतान का राह देखा जा रहा है।  टाटा स्टील ने अपना पक्ष रखते हुये बताया है कि लगभग 1861 एकड़ जमीन के अधिग्रहण के लिये उसने निर्धारित राशि सरकार के पास जमा कर दी थी। अधिग्रहण एवं भुगतान की प्रक्रिया भू-अर्जन विभाग द्वारा की गयी थी। अत: टाटा स्टील इस जिम्मेवारी से अलग है। जब विस्थापितों ने अलग-अलग परिवारों को किये गये भुगतान का विस्तृत ब्यौरा मांगा तो प्रशासन एवं टाटा स्टील दोनों ही इस दिशा में जिम्मेवार भूमिका अदा करते नजर नहीं आये। यह सही है कि डिमना बांध संबंधित सारे दस्तावेज चार्इबासा में है और यह मामला भी काफी पुराना है।  हमारी अपेक्षा है कि समुचित तत्परता के द्वारा ये दस्तावेज हासिल किये जा सकते हैं और इस बिंदु का निपटारा किया जा सकता है।

 4. डिमना बांध के लिये जमीन का अधिग्रहण जनहित में किया गया था। इस आशय का एक एमओयू बिहार के तत्कालिन गवर्नर एवं टिस्को के बीच हुआ था। स्पष्ट है कि डिमना बांध का पानी पेयजल के उपयोग के लिये है। लेकिन आज टाटा स्टील की अनुसंगी कंपनी जुस्को के द्वारा पानी का व्यापार किया जा रहा है। नागरिकों को पेयजल उपलब्ध कराने में होनेवाले खर्च अर्थात उपयोगिता मूल्य लेना तो गैरवाजिब नहीं है परंतु उपयोगिता मूल्य से अधिक अनाप-सनाप तरीके से कीमत लेना न केवल एमओयू का उल्लंघन है बलिक शुद्ध रूप से एक व्यवसाय है।  सरकार का दायित्व है कि जल वितरण के वास्तविक खर्च का आकल कर उसकी कीमत निर्धारित की जाय अन्यथा इसके लाभ में विस्थापितों को भी हिस्सेदार बनाया जाय।

  5. विस्थापितों की एक मांग यह भी है कि कंपनी कर्मचारियों को जिस प्रकार शिक्षा एवं स्वास्थ्य की सुविधाएं दी जा रही है वैसी ही सुविधाएं विस्थापितों को भी उपलब्ध करायी
जाय। इस संदर्भ में यह सुझाव भी दिया गया था कि डूब क्षेत्र के संलग्न इलाके में एक स्थायी डिस्पेन्शरी एवं एक हार्इ स्कूल की स्थापना की जाय।  कंपनी द्वारा इस क्षेत्र में फिलहाल एक कोचिंग सेंटर खोला गया है और दो स्थानों पर मोबार्इल किलनिक साप्ताहिक तौर जाता है। लेकिन हमारी जरूरत तो ज्यादा है।

उपरोक्त जरूरी व्याख्याओं के साथ हम अपनी मांगों को निम्न प्रकार से सुत्रबद्ध कर रहे हैं


1. टिस्को अतिक्रमित 102 एकड़ जमीन  की क्षतिपूर्ति दी जाय।
2. डिमना बांध में अन-अधिग्रहित 3.84 एकड़ जमीन के फसल के नुकसान की क्षतिपूर्ति दी जाय, उसे मुक्त किया जाय या कानूनी व्यवस्था की जाय।
3. डिमना बांध के विस्थापितों को बकाया मुआवजा, नौकरी तथा पुनर्वास का हक दिया जाय।
4. टाटा कंपनी द्वारा विस्थापित परिवारों को डिमना बांध के पानी के उपयोगिता मूल्य तथा लाभांश का आधा हिस्सा दिया जाय।
5. डिमना बांध में नौका विहार एवं मछली पालन का अधिकार विस्थापितों के समूह को दिया जाय।
6. टाटा कंपनी के कर्मचारियों की तरह विस्थापित परिवारों को भी चिकित्सा एवं शिक्षा सुविधा दी जाए।
7. डिमना बांध के किनारे अमरी पौधे की झाडि़यों को नियमित रूप से साफ किया जाये।
8. डिमना बांध के किनारे-किनारे लिफ्ट एरीगेशन द्वारा सिंचार्इ की व्यवस्था की जाय।
9. कारर्पोरेट सामाजिक दायित्व के तहत डूब प्रभावित क्षेत्र में ग्रामसभा की सहमति से विकास कार्य किया जाय।
10. लायलम एवं बोंटा पंचायत को पूर्ववत पटमदा प्रखंड में रखा जाय।
11. वनाधिकार कानून को शीघ्रता से लागू किया जाय।

  आशा है कि आप उपरोक्त मांगों पर तत्परतापूर्वक कार्रवार्इ कर हमारी परेशानियों को दूर करेंगे। सधन्यवाद।।  

निवेदक

झारखण्ड मुक्ति वाहिनी                                         विभिन्न ग्राम सभा के प्रतिनिधिगण

टाटा कंपनी द्वारा डिमना बांध से किए गये विस्थापितों के न्याय के लिए


जल जंगल जमीन की लूट,       अतीत के विस्थापितों को न्याय चाहिए,
नहीं किसी को इसकी छूट।              डिमना बांध के विस्थापितों को न्याय चाहिए।


प्रिय साथी जोहार,
टाटा कंपनी को कालीमाटी से कोरस तक पहुंचने में डिमना बांध के विस्थापितों का क्या योगदान है, किसी को भी पूछा जाय तो स्पष्ट रूप से जवाब आयेगा कि डिमना बांध विस्थापितों ने टाटा कंपनी के विकास के लिए अपने पूर्वजों के गांव को त्याग कर जमीन दिया। बांध से ()12 मौजा जलमग्न हैं। विस्थापित परिवार दलमा के तरार्इ पर बसने के लिए मजबूर हुए। आज भी देखा जा सकता है कि विस्थापित लकड़ी, दातून, पत्ता आदि बेचकर किसी तरह दिन गुजार रहे हैं।
टाटा कंपनी की जिम्मेदारी बनती है कि कम से कम कार्पोरेट सोशल रिस्पान्सबिलिटी के तहत कुछ बुनियादी विकास के लिए काम करे। आज तक कोर्इ ठोस काम नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि इन क्षेत्रों के विकास के लिए भविष्य की योजना ही नहीं है। अंग्रेजो के शासन काल से झारखंड की जल, जंगल, जमीन और खनिज के दोहन के बदले आदिवासी-मूलवासी के विकास के लिए व्यापक योजना चाहिए थी।
डिमना बांध विस्थापितों के मांग एवं न्याय के लिए विगत पांच वर्षों से आंदोलन जारी है। रैली, जुलूस, धरना-प्रदर्शन, अनशन आदि कार्यक्रम किये गये हैं। इस दौरान अनुमंडल पदाधिकारी, धालभूम की अध्यक्षता एवं भूमिसुधार उपसमाहर्ता के सहयोग से 19 दौर की त्रिपक्षीय वार्ता हो चुकी है। न चाहते हुए भी टाटा कंपनी को वार्ता में आकर जवाब देने के लिए बाध्य होना पड़ा। वार्ता के माध्यम से समस्याएं पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी हैं और एक निष्कर्ष बना है, केवल निर्णय लेना शेष है। लेकिन दु:ख की बात है कि लगभग एक वर्ष बीतने के बावजूद टाटा कंपनी एवं प्रशासन की ओर से अपेक्षित गंभीरता नहीं रही है, जिसकी वजह से मामला टलता रहा है। दूसरी ओर मौजा पुनसा के 3.84 एकड़ और लायलम के 1.99 एकड़ पर धान की फसल डुब में आने से किसानों को क्षति हो रही है। पिछले दिनों रैयतों ने टाटा कंपनी के प्रबंध निदेशक और जुस्को के महाप्रबंधक के नाम से बोड़ाम थाना में आदिवासी रैयतों को प्रताडि़त करने और फसल बर्बाद करने पर सनहा दर्ज की गयी है।
हमारी मांग निम्न है -
1. टाटा कंपनी अतिक्रमित 102 एकड़ जमीन की क्षतिपूर्ति दी जाये।
2. डिमना बांध में अन-अधिग्रहित मौजा पुनसा के 3.84 एकड़ और लायलम के 1.99 एकड़ जमीन के फसल के नुकसान की क्षतिपूर्ति दे।
3. डिमना बांध के विस्थापितों को बकाया मुआवजा, नौकरी और पुनर्वास की व्यवस्था की जाय।
4. टाटा कंपनी के द्वारा विस्थापित परिवारों को डिमना के पानी के उपयोगिता मूल्य या लाभ का आधा हिस्सा दिया जाए।
5. डिमना बांध में नौकाचालन और मत्स्य पालन का अधिकार विस्थापितों के समूह को दिया जाये।
6. टाटा स्टील के कर्मचारियों की तरह विस्थापित परिवारों को भी नौकरी, चिकित्सा और शिक्षा की सुविधायें दी जायें।
7. डिमना बांध के किनारे अमरी पौधे की झाडि़यो को नियमित रूप से साफ किया जाये।
8. डिमना बांध के किनारे-किनारे लिफट-इरिगेशन द्वारा सिंचार्इ की व्यवस्था की जाये।
9. कार्पोरेट सामाजिक दायित्व के तहत विस्थापित इलाको में ग्राम सभा की सहमति से विकास कार्य किया जाय।

1. आंदोलन की शुरूआत एक विशाल रैली के साथ 06 जनवरी 2009 को किया गया। जुस्को प्रबंधक को 12 सूत्री मांग पत्र सौंपा गया जिनमें से 7 मांग डिमना बांध संबंधित था एवं अन्य 5 मांग राज्य सरकार से संबंधित था।
2. जमशेद जी टाटा के जन्म जयंती 03 मार्च 2009 को जमशेदपुर में विरोध प्रदर्शन किया गया।
3. 09 मार्च को प्रतिनिधिमंडल द्वारा तत्कालिन उपायुक्त, नितिन मदन कुलकर्णी को ज्ञापन दिया गया।
4. 06 जनवरी 2010 को 14 सूत्री मांग पत्र पूर्वी सिंहभूम के तत्कालिन उपायक्त, रविन्द्र अग्रवाल को सौंपा गया। जिनमें 7 मांग डिमना बांध संबंधित था।
5. जमशेद जी टाटा के जन्म जयंती 03 मार्च 2010 को डिमना बांध के समक्ष टी.एम.डी.सी कार्यालय की घेराव किया गया।
6. 26 अक्टूबर 2010 को आम बागान मैदान से टाटा स्टील के जेनरल गेट तक जुलूश एवं गेट के समक्ष धरना दिया गया।
7. 13 - 17 फरवरी 2012 तक 11 सूत्री मांग पत्र जिनमें 8 मांग डिमना बांध संबंधित था। इन मांगों को लेकर 5 दिनों का अनिशिचतकालिन अनशन उपायुक्त कार्यालय के समक्ष किया गया।
8. 02 मार्च 2012 को डिमना बांध के समक्ष टी.एम.डी.सी कार्यालय की घेराव किया गया।
9. 23 जुलार्इ 2013 को 10 सूत्री मांग पत्र जिनमें 8 डिमना बांध के संबंधित उपायुक्त कार्यालय के समक्ष एक दिवसीय धरना दिया गया।
10. 24 अगस्त 2013 को डिमना बांध का जल स्तर बढ़ जाने से पुनसा एवं लायलम के रैयतों का खेत का फसल नस्ट होने के संबंध में बोड़ाम थाना में प्रथमिकी दर्ज करने की मांग। एवं झामुवा की ओर से बोड़ाम अंचलाधिकारी को ज्ञाापन दिया गया।
11. 30 सितम्बर -01 अक्टूबर 2013 तक जन जल सत्याग्रह एवं 02 अक्टूबर 2013 को 125 लोगों की गिरफतारियां हुर्इ।


कुमार दिलीप    

Thursday, 6 February 2014

स्थानीयता/डोमिसाइल


अपना झारखंड प्रांत इस मायने में सर्वाधिक अक्षम और असफल राज्य है कि यहाँ स्थानीयता प्राथमिकता या डोमिसाइल सम्बन्धी नीति या विधान अबतक नहीं बना है। आपको याद ही होगा कि पिछले सरकार से झामुमो की समर्थन वापसी और नये सरकार के गठन का एक महत्वपूर्ण मसला स्थानीयता की नीति के निर्माण का भी था।
      यह समझने और उस पर अमल करने की सख्त जरूरत है कि प्रांतीय सरकार की नौकरियों में प्रांत के स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देना निर्विवाद और सर्वमान्य शासकीय परंपरा है। यह परंपरा संविधान और विधान के द्वारा समर्थित है। नियोजन में अवसरों की मौजूद प्रांतीय और क्षेत्रीय विषमता के तथ्य को ध्यान में रखते हुए संविधान के प्रावधान में इस तरह की व्यवस्था का स्पष्ट और विशेष उल्लेख किया गया है। अत: बिना कोर्इ देर किये झारखंड के लोगों के हित और भावना का ख्याल करते हुए स्थानीयता के निर्धारण की स्पष्ट कसौटियों तथा प्राथमिकता के स्पष्ट खाका के साथ नियोजन में स्थानीयता प्राथमिकता की नीति बनानी चाहिए और उसकी शासकीय सूचना जारी करनी चाहिए। इस संदर्भ में हम सभी संगठन अपनी ओर से एक खाका पेश कर रहे हैं। इस खाका में उलिलखित बिन्दुओं का होना किसी भी सच्ची झारखंड पक्षीय नीति के लिए अनिवार्य है, ऐसा हमारा मानना है।
स्थानीयता के निर्धारण की कसौटियां या प्रमाण
1.    झारखंड के किसी गांव में वंशानुगत निवास
2.    झारखंड के किसी गांव में पैतृक भुसम्पति या वंशानुगत सम्पति
3.    झारखंड के किसी गांव में पुश्तैनी मकान  वास भूमि
इन तीनों के लिए वंशावली के उल्लेख के साथ ग्रामसभा द्वारा जारी प्रमाणपत्र होना चाहिए।
4.    राज्य की जाति सूची में वर्णित जाति का सदस्य होने का प्रमाण। इसके लिए ग्रामसभा का प्रमाणपत्र हो जिसमें गोत्र का भी उल्लेख हो।
5.    राज्य की मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय और जनजातीय भाषा में किसी एक भाषा का भाषा-भाषी होने का प्रमाण
6.    अगर दावेदार का झारखंड के किसी गांव के साथ वंशानुगत संपर्क न हो या उसका प्रमाण न हो और वह शहर में रहता हो तो माता-पिता का न्यूनतम 30 वर्ष से निरंतर निवास तथा आवेदकदावेदार का प्रांत में ही प्राथमिक से लेकर 12वीं तक की शिक्षा का प्रमाण।
इस संदर्भ में अभी जब नीति लागू हो तब 5 वर्षों के लिए 1970 से माता-पिता के निवास का प्रमाणपत्र अनिवार्य किया जाना चाहिए। अर्थात 1970 अभी कट आफ इयर होना चाहिए । वैसे बाद में नौकरी में स्थानीयता की प्राथमिकता के लिए कट आफ इयर की जरूरत नहीं होगी, निवास की न्यूनतम अवधि की कसौटी की जरूरत होगी।
7.    दावेदार का प्रथमश्रेणी के मजिस्ट्रेट से सत्यापित शपथ पत्र (मूलवासस्थायीवासवर्तमान वास के सम्पूर्ण विवरण के साथ) कि वह उसी प्रांत का स्थानीय है और स्थानीयता की प्राथमिकता का हकदार है। वह किसी अन्य प्रांत की स्थानीयता का दावेदार नहीं है। अगर कहीं और से स्थानीयता का दावेदार पाया गया तो वह नियोजन-ए सम्पति लाभ वापसी और सजा का पात्र होगा।
नोट : नियोजन के आवेदन के साथ फोटो, शैक्षणिक प्रमाणपत्र और स्थानीयता के प्रमाणपत्र के साथ बायोमेटि्रक्स पहचान का इंतजाम और प्रावधान करने से पारदर्शिता तथा र्इमानदारी सुनिशिचत हो सकेगी। इसके लिए यूआर्इडी प्राधिकार के साथ सहयोग भी बनाया जा सकता है।

नियोजन में स्थानीयता का प्राथमिकता का स्वरूप
      तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के साथ ही उच्च श्रेणी की सरकरी प्रांतीय नौकरियों में सुनिशिचत सहभागिता का स्वरूप इस प्रकार का होना चाहिए :
1.    झारखंड के गांव में आनुवंशिक निवास व अन्य प्रमाण से लैस लोगों की सहभगिता - 80 प्रतिशत
2.    30 साल से झारखंड के शहरों में निरंतर निवास और प्राथमिक स्तर से 12वीं तक की झारखंड में शिक्षा के प्रमाण तथा व्यकितगत शपथ पत्र से लैस दावेदारों की सहभागिता - 10 प्रतिशत
3.    राष्ट्रीय स्तर पर सभी लोगों की खुली सहभागिता - 10 प्रतिशत
नौकरी के लिये होने वाली जांच परीक्षाओं के लिए कुछ जरूरी प्रावधान
इन दिनों हर तरह की नौकरी के लिये परीक्षा का चलन है। जिनमें चलन नहीं है, उनमें भी यह चलन शुरु हो तो पक्षपात की संभावना कम होने की ही उम्मीद बनेगी। हर सरकारी सेवक को किसी न किसी रूप में उस शासन क्षेत्र के समुदाय, संस्कृति, भाषा, भूगोल से जुड़ना ही पड़ता है। इस कारण वहां के समुदायों, उनकी भाषाओं, उनकी संस्कृति, उनके भौगोलिक परिवेश से परिचय और अंतरंगता एक आवश्यक योग्यता होनी ही चाहिए। इसी योग्यता की अपेक्षा को समझते हुये परीक्षा का स्वरूप तय होना चाहिए। इस संदर्भ में सुझाव है कि कुल जितने पूर्णांक की परीक्षा हो उसके न्यूनतम एक-चौथार्इ अंक की परीक्षा प्रांत की मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय या जनजातीय भाषा में होनी चाहिए। इस विषय में भाषा ज्ञान झारखंड के संस्कृति ज्ञान, भूगोल ज्ञान, धर्म व रीति-रिवाज  ज्ञान और अन्य सामान्य ज्ञान से जुड़े प्रश्न होने चाहिए। इस विषय में न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक लाना नौकरी की योग्यता की अनिवार्य शर्त मानी जानी चाहिए। उदाहरण के लिए अगर परीक्षा कुल 400 अंकों की है तो झारखंडी भाषा और सामान्य ज्ञान के विषय का पूर्णांक कम से कम 100 होना चाहिए और उस 100 में 40 अंक लाना अनिवार्य होना चाहिए।
नोट : झारखंड की मान्यता प्राप्त भाषा में उन्हीं भाषाओं को रखना चाहिए जो शुरू से रांची विश्वविधालय के जनजातीय और क्षेत्रीय भाषा विभाग में हैं। बिहार की आंचलिक या लोक भाषाओं, बांग्ला, छतीसगढ़ी, उडि़या, उर्दू को  इसमें जगह नहीं मिलनी चाहिए।
ऐसा कोर्इ फैसला करना ही तो पूरे झारखंड के गांवों की भाषार्इ सर्वेक्षण के बाद ही होना चाहिए। शहरों में तो बहुत सारी भाषायें बोली जाती हैं, जो उस प्रांत की आंचलिक भाषायें भी नहीं होती। सीमांत गांवों में भाषाओं का घालमेल होता है। (क्या बंगाल में मैथिली, ओडिशा में बांग्ला, छतीसगढ़ में मगही और कुड़ुख आदि को नौकरी की परीक्षा में रखा जाता है - यह भी जानना चाहिए)।

स्थानीयता प्राथमिकता नीति के बारे में संयुक्त प्रेस वक्तव्य



1.    जनमुकित संघर्ष वाहिनी, छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी, झारखंड मुकित वाहिनी, सी.पी.आर्इ.(एम.एल.) और हुल झारखंड क्रांति दल ने स्थानीयता या डोमिसाइल प्राथमिकता की नीति के संदर्भ में अपना वैचारिक मंतव्य जाहिर करने के लिए यह प्रेस सम्मेलन बुलाया है। इन संगठनों ने अलग-अलग और साथ-साथ कर्इ दौरो में आन्तरिक बहस चलायी है, सामुहिक विमर्श किया है और एक संतुलित और संतोषजनक प्रारूप तैयार किया है। इस प्रारूप के साथ मुख्यमंत्री को एक मेमोरेन्डम भी भेजा गया है।
2.    सर्वप्रथम यह कहने की जरूरत है कि स्थानीयता को प्राथमिकता देने का प्रावधान क्षेत्रीय विषमता को घटाने, संघात्मक और विकेंदि्रत संरचना को मजबूत करने, राष्ट्रीयता की जड़ों को गहरार्इ देने का सकारात्मक प्रावधान है। यह संविधान सम्मत भी है और इसकी दीर्घकालिक, निर्विवाद, सर्वमान्य शासकीय परंपरा भी सभी प्रांतों में है। स्थानीयता प्राथमिकता के मसले को असंवैधानिक बताना संकीर्ण, अवसरवादी और औपनिवेशिक मनसिकता का परिचायक है।
3.    झारखंड में सरकारी नौकरी के लिए स्थानीयता की निम्नलिखित निर्धारक कसौअियां होनी चाहिए,
क. वंशावली के उल्लेख के साथ गांव में वंशानुगत निवास का ग्रामसभा का प्रमाण पत्र
ख. ग्रामीण क्षेत्र में वंशानुगत सम्पति का कागजात
ग. ग्रामीण क्षेत्र में पुश्तैनी मकानवासभूमि का सविवरण ग्रामसभा का प्रमाण पत्र
घ. राज्य की जनजाति सूची में वर्णित जाति में किसी जाति का सदस्य होने का गोत्र के उल्लेख के साथ ग्रामसभा का प्रमाण पत्र
ड. राज्य की मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय या जनजातीय भाषा में किसी एक का भाषाभाषी होने का प्रमाण
च. शहरी क्षेत्र में न्यूनतम 30 वर्ष से मातापिता के निरंतर निवास और स्यवं के प्राथमिक स्तर से 12वीं तक की शिक्षा झारखंड में लेने का प्रमाण
छ. जब नीति लागू हो, तब से 5 वर्ष के लिए इस शहरी निवास के संदर्भ में 1970 का वर्ष कटआफ इयर के रूप में हो (झारखंड बनने के 30 साल पहले)
ज. प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट से सत्यापित शपथ पत्र (मूलवासस्थायीवासवर्तमान निवास के सम्पूर्ण विवरण के साथ) कि व्यकित उसी प्रांत का स्थायी है, स्थानीयता प्राथमिकता का हकदार है। किसी अन्य प्रांत की स्थानीयता प्राथमिकता का हकदार नहीं। अगर कहीं और की स्थानीयता की दावेदारी पायी गयी तो वह व्यकित नियोजन समापित, लाभवापसी और सजा का पात्र होगा।
नोट:- सभी का आवश्यक कागजातों के साथ बायोमेटि्रक पहचान भी संलग्न करने की व्यवश्था करना अच्छा होगा।
4.    प्रांत की तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरी के साथ ही उच्चश्रेणी की प्रांतीय सरकारी नौकरियों में सुनिशिचत सहभाहिता का रूप इस प्रकार का होना चाहिए।
·       झारखंड के गांव में आनुवंशिक निवास व अन्य प्रमाणों से लैस लोगों की सहभागिता - 80 प्रतिशत
·       झारखंड के शहर में न्यूनतम निरंतर 30 साल के निवास, झारखंड में शिक्षा और व्यकितगत शपथ पत्र से लैस दावेदारों की सहभागिता - 10 प्रतिशत
·       राष्ट्रीय स्तर पर सहभागिता के लिए खुला - 10 प्रतिशत
5.    प्रांतीय सरकारी नौकरियों के लिए जो परीक्षायें होती हैं, उसमें झारखंडी भाषा, संस्कृति एवं अन्य सामान्य ज्ञान से संबंधित प्रश्नों की एक अनिवार्य और निशिचत हिस्सेदारी होनी चाहिए।
कुल जितने अंकों  की परीक्षा है, उसके एक-चौथार्इ अंक (25 प्रतिशत अंक) का एक अलग पेपर हो। इस पेपर का भाषार्इ माध्यम झारखंड की मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं में हो। इस पेपर में झारखंड के भाषा, संस्कृति, भूगोल, धर्म व रीति-रिवाज और अन्य सामान्य ज्ञान से जुड़े प्रश्न हो। इस पेपर में 40 प्रतिशत अंक लाना चयन के अनिवार्य शर्त हो। इस संदर्भ में 60 के दशक में प्रोन्नति के लिए आवश्यक जनजातीय भाषा के ज्ञान का प्रावधान उल्लेखनीय है।
6.    इसके साथ ही हम बताना आवश्यक समझते हैं कि नौकरियों में स्थानीयता की प्राथमिकता झारखंड की सारी समस्याओं का समाधान नहीं है। बेरोजगारी का भी यह समाधान नहीं। यह न्यायपूर्ण अवसर देने का एक प्रावधान भर है। बेरोजगारी, गरीबी, विषमता के लिए नीतियों में बुनियादी बदलाव का जोरदार संघर्ष आवश्यक होगा। तमाम वंचित जनों को इसके लिए एक साथ आना होगा।


जनमुकित संघर्ष वाहिनी  छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी
झारखंड मुकित वाहिनी    सी.पी.आर्इ. (एम.एल.)
           हुल झारखंड क्रांति दल

झारखण्ड मुक्ति वाहिनी का संविधान


आंतरिक औपनिवेशिक शोषण की समापित, स्वाबलम्बन व स्वशासन पर आधारित समतामूलक समाज और सांस्कृतिक नवजागरण के लिए समर्पित संगठन, जिसका संघर्ष, उसका नेतृत्व और हासिये पर खड़े समूहों की सहभगीता के साथ शांतिमयता के मूल मंत्र पर सक्रिय संगठन, मौजूदा संसदीय लोकतंत्र को सहभगी लोकतंत्र बनाने की दिशा में चलते हुए विकेंदि्रत शासन प्रणाली की स्थापना, ग्रामसभा को नाभिकीय इकार्इ बनाना एवं जन सत्ता के केन्द्रों को विकसित करना जिसका प्रमुख लक्ष्य.
संगठन का उददेश्य
- झारखण्डी जनता का झारखण्ड के संसाधनों पर नियंत्रण
- आदिवासी-मूलवासी, सदान और अल्पसंख्यकों की एकता पर आधारित झारखंडी संस्कृति की सुरक्षा
- झारखंड से सटे समीपवर्ती राज्यों के आदिवासीबहुल इलाकों को मिला कर संपूर्ण झारखंड का निर्माण
- कृषि एवं ग्रामोन्मुख विकास नीति
- झारखंडी भाषा का विकास, झारखंडी भाषा को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाना
- निजी धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए हर तरह के धर्मान्तरण के अभियान का विरोध एवं झारखंडियों के प्रकृति पूजन धर्म को मिटाने की साजिश का विरोध, साथ ही उसे राजकीय मान्यता दिलाना
- डायन प्रथा, ओझा गुणी जैसे अंधविशवास एव ंदहेज, बहुविवाह व शराबखोरी जैसी कुरीतियों का पुरजोर विरोध
संगठन का ढांचा
- राज्य स्तरीय केंद्रीय समिति
- एक प्रधान
- उप समितियों के प्रधान
- टोला, पंचायत, प्रखंड एवं जिला स्तर पर कमेटी
- सभी नीतिगत फैसले केंद्रीय समिति करेगी
पदाधिकारियों का चयन
 - समितियों का कार्यकाल दो वर्ष का होगा
- वार्षिक अधिवेशन में कमेटियों से लोगों को हटाया या जोड़ा जा सकता है
- लोकतांत्रिक प्रक्रिया लनमत से पदाधिकारियों का चयन
- पदाधिकारियों के चयन में संगठन के संदस्य भाग लेंगे
       भिन्न राजनीतिक दल और संगठन के सदस्य संगठन के पदाधिकारी नहीं हो सकते, संगठन का पदाधिकारी बनाने के लिए एक झारखंडी भाषा का ज्ञान जरूरी है।
सदस्यता के लिए शर्तें
- हर वह व्यकित जो संगठन के मूल सिदधांत पर विश्वास करता है, वह संगठन का सदस्य बन सकता है।
- संगठन को नियमित समय दे, अपनी आय का एक हिस्सा दे और संगठन के कार्यक्रमों में भाग ले।
- मानव मात्र की समता में विश्वास करता हो।
- स्त्री का सम्मान करता हो और स्त्री उत्पीड़न जैसे दुगर्ुणों से मुक्त हो।
- डायन, ओझा गुणी, बहुविवाह, शराबखोरी का विरोध हो।
झंडा
- संगठन का एक झंडा होगा।
- झंडा का आधार रंग हरा होगा।
- झंडे के मध्य में जल, जंगल, जमीन का प्रतीक चिन्ह और लहराते हाथ नीले रंग से उकेरे जायेंगे।
झारखण्ड दिवस
- संगठन झारखंडी जनता के संघर्षपूर्ण इतिहास के आदिविद्रोही तिलका मांझी के शहादत दिवस को झारखंड दिवस के रूप में मनायेगी।
वार्षिक अधिवेशन
- प्रत्येक वर्ष संगठन दो दिनों का अधिवेशन आयोजित करेगी जिसमें पिछले वर्ष के कार्यकलापों की समीक्षा, प्रधान के द्वारा वार्षिक प्रतिवेदन और अगले वर्ष की कार्य योजनाओं पर चर्चा होगी।
- वार्षिक अधिवेशन में ही प्रधान या प्रधान द्वारा नियुक्त व्यकित संगठन के आय व्यय का ब्योरा देगा।

संशोधन 9-10 अप्रैल 2008, मितान जुमिद
- पंच प्रधान होगा जिसमें एक संयोजक होगा।
- केंदि्रय समिति का सदस्य चुनाव नहीं लड़ेगी।
- केप्शन झारखंडी शकित के नवजागरण, आंतरिक औपनिवेशिक शोषण से झारखंड की मुकित और झारखंड के नवनिर्माण के लिए समर्पित संगठन होगी
- भिन्न विचारधारा राजनीतिक दल और संगठन के सदस्य वाला वाक्यांश हटा देना चाहिए।
- पदाधिकारियों को एक मूल भाषा सिखनाजानना होगा।
- संगठन का नाम झारखंड मुकित वाहिनी होगा।
- झारखंड क्षेत्र में असंगठित मजदूर वर्ग के साथ एकता कायम कर परिवर्तन के संघर्ष को विकसित करना
- पदाधिकारियों को वापस बुलाने का अधिकार केंदिय समिति को होगा। सम्मेलन, अधिवेशन या आपातकाल बैठक बुलाकर उसका सदस्यता खत्म किया जा सकता है।